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अटपटी सम्भावनाओं के स्वप्न!

“आख़िर मौलाना महमूद मदनी अचानक ऐसी ‘अटपटी’ सम्भावनाओं का स्वप्न क्यों बुनने लग गये कि 2014 आते-आते मुसलमानों को बीजेपी और मोदी अच्छे भी लगने लग सकते हैं!”

हुज़ूर मदनी साहब, आख़िर माजरा क्या है? क़यास पर क़यास लग रहे हैं. लोग अपनी-अपनी अक़्ल के घोड़े दौड़ा कर पता करने में लगे हैं. बीजेपी ख़ुश है! माफ़ कीजिएगा, मुझे अचानक ‘रंगा ख़ुश’ याद आ गया! बेचारी सेकुलर पार्टियों का तो मुँह ही उतर गया. सारे देश के मुल्ला-मौलवियों की नींद अचानक टूट गयी. दारुल उलूम देवबन्द जैसी संस्था से जुड़े और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के महासचिव मौलाना महमूद मदनी का दिल अगर नरेन्द्र मोदी को लेकर पसीजने लगे तो धमाका तो होगा ही.
वैसे मदनी साहब का कहना है कि उन्होंने अपने इंटरव्यू में तो सिर्फ ज़मीनी हक़ीक़त का ज़िक्र किया था कि गुजरात में बहुत-से मुसलमानों ने इस बार मोदी को वोट दिया. बिहार में भी नीतिश कुमार के कारण कई जगहों पर मुसलमानों ने  बीजेपी को वोट दिया है. यानी “बड़ा चेंज आ रहा है, सिचुएशन चेंज हो रही है और यक़ीनन गुजरात के लोग (मुसलमान) अलग तरीक़े से सोच रहे हैं.” हालाँकि वह आगे साफ़ करते हैं कि ज़रूरी नहीं कि जो कुछ गुजरात और बिहार में घटित हो रहा है, उसका प्रतिबिम्ब पूरे देश में दिखे, लेकिन उन्होंने एक बेहद महत्त्वपूर्ण बात कही, जिसकी तरफ़ शायद लोगों का ध्यान नहीं गया. उन्होंने कहा, “2002 की दुर्घटना को जितने गर्व के साथ वह (मोदी) लेते आये हैं, वह इसमें सबसे बड़ी रुकावट है कि हम कह दें कि सब ठीक है.” जब उनसे पूछा गया कि अब तो मोदी उन सब बातों की कोई चर्चा नहीं करते और सिर्फ विकास की बात करते हैं तो मदनी साहब का जवाब था,”कुछ अफ़सोस (गुजरात दंगों पर) होना चाहिए था. विकास इन्साफ़ के बग़ैर कैसे होगा?” और मदनी ने यह भी साफ़ किया कि उनकी नज़र में सेकुलर पार्टियाँ मोदी या बीजेपी से बेहतर नहीं हैं! Continue reading


कब तक चलेगी ये वोटखेंचू राजनीति?

“जो लोग ये मानते हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियाँ ‘जन-विरोधी’ और ‘ ग़रीब- विरोधी’ हैं, उन्हें ‘बन्द’ के हल्ले-ग़ुल्ले’, ‘थर्ड फ़्रंट की तिकड़म’ और सरकार के लिए संकट खड़ा करने के बजाय क्या आर्थिक नीति का कोई वैकल्पिक माॅडल देश के सामने नहीं रखना चाहिए था ताकि देश की जनता यह तय कर सके कि उसके लिए कौन-सा रास्ता सही है.”

पिछले एक हफ़्ते से चल रही राजनीतिक नौटंकी आख़िर ख़त्म हो गयी. उन क़यासबाज़ों को सचमुच बड़ी निराशा हुई होगी, जो सरकार के गिरने और मध्यावधि चुनाव की अटकलें लगालगाकर अपने फेफड़े थका रहे थे. तृणमूल काँग्रेस के हट जाने के बावजूद अब ये तय है कि सरकार नहीं गिरेगी, कम से कम तब तक, जब तक मायावती और मुलायम में से कोई एक यूपीए के साथ बना रहता है. फ़िलहाल तो दोनों की जुगलबन्दी सरकार के साथ चल रही है. Continue reading

असम हिंसा के यक्ष प्रश्न

असम हिंसा के यक्ष प्रश्न

“हम बार-बार इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि हमारे पड़ोस में हमारा एक ऐसा ‘दोस्त’ है जो हमसे अपनी दुश्मनी कभी नहीं छोड़ सकता क्योंकि उसका समूचा अस्तित्व ही ‘ऐंटी-इंडिया’ की हाइपोथीसिस’ पर टिका हुआ है. हमें अपनी भविष्य की पाकिस्तान नीति पर फिर से और अत्यन्त गम्भीरता से सोचना होगा और उसमें ‘रिज़ल्ट-ओरियेण्टेड’ बदलाव लाने होंगे.”

देश के कई हिस्सों से उत्तर पूर्व के लोगों का पलायन और मुम्बई के बाद उत्तर प्रदेश के कई शहरों में मुसलमानों के हिंसक प्रदर्शन का सिलसिला  निश्चित तौर पर एक गहरी साज़िश का नतीजा लगता है. यह बड़ी चिन्ता की बात है कि देश का ख़ुफ़िया तंत्र जहाँ इस साज़िश की बू सूँघ पाने में पूरी तरह विफल रहा, वहीं हमारे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र को भी जागने और स्थिति की भयावहता का अनुमान लगा पाने में इतनी देर लग गयी. सरकार, प्रशासन, ख़ुफ़िया तंत्र और मीडिया– सभी इस ख़तरे को भाँप पाने में इस हद तक विफल क्यों रहे? क्या इस लिए कि इस मामले की शुरुआत असम जैसे एक राज्य से हुई थी, जो देश के ‘मेन लैण्डस्केप’ से दूर कहीं हाशिये पर है और सभी यह माने बैठे थे कि यह केवल स्थानीय स्तर पर पसरे एक जातीय तनाव का मामला है और एक सीमित दायरे के भीतर ही रहेगा और स्थानीय प्रशासनिक मशीनरी इसे अपने स्तर पर नियंत्रित कर लेगी. शुरुआती तौर पर ऐसा सोचना शायद ग़लत भी नहीं था क्योंकि असम में ऐसे जातीय संघर्ष कोई नयी बात नहीं हैं. Continue reading


विकास की बाँसुरी, हिन्दुत्व का मसाला

 विकास की बाँसुरी, हिन्दुत्व का मसाला

“पिछले डेढ़ दशक से बीजेपी ने हिन्दुत्व के एजेंडे को डीप फ़्रीज़र में रखा हुआ था. क्योंकि एक तो वह सत्ता की राजनीति को ततैया की तरह काट रहा था और दूसरे बीजेपी के पास ऐसा कोई नेता बचा भी नहीं था कि वह ‘हिन्दुत्व की धर्मध्वजा’ को अपने कँधों पर ले कर चल सके. लेकिन अब, जबकि बीजेपी के पास मोदी के अलावा कोई विकल्प नहीं है और गुजरात दंगों का जिन्न फिर बोतल से बाहर आयेगा ही, ऐसे में मोदीत्व के साथ हिन्दुत्व को जोड़ कर ‘मोहिन्दुत्व’ की दुधारी तलवार से बेहतर जुआ संघ खेल भी नहीं सकता था.”

तो जनाब बिगुल तो बज चुका है! 2014 या मुलायम सिंह की मानें तो 2013 में कभी भी लोकसभा के लिए होनेवाले ‘वोटरलू’ के लिए (क्योंकि यह चुनाव राहुल गाँधी या नरेन्द्र मोदी में से किसी न किसी के लिए तो ज़रूर वाटरलू साबित होगा) सेनाएँ तैयार होने लगी हैं, हथियार निकलने लगे हैं, युद्ध-समीक्षकों का दम फूलने लगा है, और वोटर अपने स्क्रीनप्ले के पात्रों, दृश्यावलियों, नाटकीय उतार-चढ़ावों और क्लाइमेक्स की रचना में जुट गया है. वैसे तो लोग हर चुनाव को महासंग्राम या महाभारत की संज्ञा दे दिया करते हैं लेकिन सच बात यह है कि इस बार का चुनाव सचमुच आधुनिक भारत के इतिहास का पहला राजनीतिक महाभारत होगा, शायद बहुत कठिन, बहुत भीषण, बहुत घमासान और बहुत अकल्पनीय स्थितियों का जनक भी! Continue reading


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