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बताइए, आपको कौन-सी जीत चाहिए?

आप जीतना चाहते हैं! भला कौन ऐसा होगा, जो जीतना न चाहे? हर कोई चाहता है कि वह जीते और हमेशा जीतता रहे. लेकिन क्या सभी जीत सकते हैं? क्या यह सम्भव है कि युद्ध में या खेल में, संघर्ष में या विमर्श में सभी जीत जायें! नहीं सम्भव है न! क्योंकि सब जीत नहीं सकते. एक जीतेगा, तो दूसरा हारेगा! किसी की हार के बिना कोई जीत सम्भव नहीं. जीतने में ही निहित है किसी का हारना, किसी को हराना! अब यह जीत- हार किसी की भी हो सकती है, किसी व्यक्ति की, किसी राष्ट्र की, किसी विचार की, किसी अवधारणा की, किसी व्यवस्था की, किसी परम्परा की, किसी रूढ़ि की, किसी स्थिति की, किसी प्रवृत्ति की. प्रवृत्ति जैसे असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय, स्थिति जैसे प्रकृति पर मनुष्य की विजय! कँटीले जंगलों और पत्थर के हथियारों से शुरू होकर आज कंक्रीट के शहरों और परमाणु हथियारों तक मानव की यात्रा दुरूह, विकट और असम्भव-सी लगनेवाली सतत विजय-गाथाओं का एक निरन्तर महाकाव्य है. Continue reading