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नमोरथ का मनोरथ : 2014 या उससे आगे?

हरा समंदर, गोपी चन्दर, बोल मेरी मछली कितना पानी. जुमे का दिन हो, कुरता भगवा के बजाय हरा हो और बीजेपी में एक ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ का राजतिलक हो रहा हो! है न कुछ अटपट! ममता बनर्जी भी जुमे को मुख्यमंत्री पद की शपथ लें और नरेन्द्र मोदी भी पार्टी में अपनी ताजपोशी के लिए जुमे का दिन ही चुनें, कुरता भी हरियाला हो जाए, जनसभाओं में बुर्क़ों और जालीदार गोल टोपियों की नुमाइश लगायी जाए तो बेचारी मछली को पानी की थाह तो लेनी ही पड़ेगी!
‘धर्मनिरपेक्षता के बुर्क़े’ से शुरू होकर अपनी सभाओं में ‘ख़रीदे गये बुर्क़ों की छटा बिखेरने’ तक नमोरथ को अपना मनोरथ पाने के लिए अभी न जाने क्या-क्या फट्टे-फच्चर कहाँ-कहाँ जुगाड़ने-उखाड़ने, काटने-पीटने और ठोकने-ठाकने पड़ेंगे, जाने कितने मुखौटे बदलने पड़ेंगे, जाने किस-किस रंग के कुरते पहनने पड़ेंगे! लेकिन फ़िलहाल तो सबसे बड़ा फच्चर हत्थे से उखड़ गया. पार्टी में अब कोई और ‘वाणी’ नहीं बची है. बस अब नमोराज है, नमोजाप है, नमोनाम है.