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गुफ़ा से बाहर निकले कौन

कोई इकतीस साल पहले की बात है, महाराष्ट्र के जलगाँव की मुसलिम पंचायत ने फ़तवा दिया कि मुसलिम औरतें सिनेमा नहीं देख सकतीं. तर्क दिया गया कि सिनेमा में अश्लील बातें होती हैं, इसलिए महिलाओं को इसे नहीं देखना चाहिए. तब वहाँ की छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की एक कार्यकर्ता रज़िया पटेल ने इसके ख़िलाफ़ संघर्ष शुरू किया और आख़िर में वह जीती भी. उन दिनों मैं मुम्बई में था और पत्रकारिता में बिलकुल नया-नया था. इसी जलगाँव की स्टोरी पर काम करते हुए मैं मुम्बई के एक बड़े मौलाना से मिलने पहुँचा. ज़ाहिर है कि उनकी निगाह में पंचायत ने ‘सही क़दम’ उठाया था. मैंने पूछा, मौलाना सिनेमा में अश्लीलता सिर्फ औरतों के लिए ही क्यों नुक़सानदेह है, मर्दों के लिए क्यों नहीं? मौलाना ने बड़ी ईमानदारी या कहें बड़ी बेचारगी से जवाब दिया कि मर्दों को रोक पाना मुमकिन ही नहीं है. औरतें तो घर में रहती हैं, उन पर यह बंदिश आसानी से लागू की जा सकती है. Continue reading