Monthly Archives: April 2013

बलात्कार के ख़िलाफ़ चाहिए एक अभियान

दिल्ली में एक और बर्बर बलात्कार से देश हतप्रभ है. रूह कँपा देनेवाली इस घटना के बाद ग़ुस्सा, हताशा, लाचारगी का एक अजीब भाव हर तरफ़ पसर गया है. किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि बलात्कारियों के बढ़ते दुस्साहस पर लगाम कभी लग भी पायेगी या नहीं. सरकार निकम्मी है, पुलिस और न्यायिक तंत्र लुप्त हो चुका है, समाज सड़ गया है, मनुष्य होने के संस्कार मर चुके हैं या फिर ऐसा क्या है कि क़रीब-क़रीब रोज़ कहीं न कहीं से जघन्य बलात्कार और उस पर संवेदनहीन पुलिस तंत्र की निष्ठुर प्रतिक्रियाओं की दिल दहला देनेवाली कहानियाँ सुनने को मिलती हैं. 16 दिसम्बर के दिल्ली बलात्कार कांड के बाद देश भर में उपजे आक्रोश के बाद जो माहौल बना था, उससे लगा था कि शायद बलात्कार जैसे अपराध के प्रति पुलिस, प्रशासन, न्यायिक मशीनरी, सरकारों और राजनीतिक तंत्र के साथ-साथ समाज और लोगों पर ज़रूर कुछ न कुछ असर पड़ा होगा. लेकिन पिछले तीन महीनों की घटनाओं से स्पष्ट है कि केवल एक क़ानून के अलावा कहीं कुछ भी नहीं बदला. Continue reading

पाकिस्तान में ख़तरे की नयी घंटी

पाकिस्तान में ख़तरे की नयी घंटी बजी है. और हो सकता है कि अगले बीस-तीस बरसों में यह हमारे लिए अब तक की सबसे ख़तरनाक और सबसे जटिल चुनौती साबित हो. पाकिस्तान एक जवान देश है, उसकी कुल आबादी में दो-तिहाई हिस्सा उन लोगों का है, जिनकी उम्र अभी तीस साल से कम है. लेकिन बुरी ख़बर यह है कि इन नौजवानों में से 94 प्रतिशत युवा अपने देश की मौजूदा हालत से बेहद निराश हैं और मानते हैं कि उनका देश ग़लत दिशा में जा रहा हैं. यही नहीं, पाकिस्तान के क़रीब 70 प्रतिशत युवा अपने आपको धार्मिक पुरातनपंथी घोषित करते हैं और मानते हैं कि विदेशी विचार, संगीत, फ़िल्म और विदेशी मीडिया के ‘कुप्रभाव’ से युवा पीढ़ी को दूर रखा जाना चाहिए. इनमें से क़रीब 38 प्रतिशत युवा देश में शरीयत के शासन के समर्थक हैं, जबकि 32 प्रतिशत को लगता है कि सैनिक शासन ज़्यादा बेहतर विकल्प है. लोकतंत्र का समर्थन करनेवाले युवाओं की संख्या सिर्फ 29 प्रतिशत है. साफ़ ज़ाहिर है कि पाकिस्तान की आबादी का दो-तिहाई हिस्सा, उसका आम नौजवान प्रगतिशील विचारों, आधुनिक और उदार जीवन शैली, लोकताँत्रिक मूल्यों से कोसों दूर एक ऐसे प्रतिगामी, धर्मान्ध, सामन्ती और रूढ़िवादी वातावरण में जी रहा है, जो एक भयावह भविष्य की ओर ही संकेत करता है. इस युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा शहरी मध्य वर्ग से आता है और चिन्ता की बात है कि उसकी सोच भी ज़्यादा अलग नहीं है. Continue reading

तीन तेरह में चौदह का गणित

पल-छिन, पल-छिन, धक-धक, धुक-धुक! नमो-नमो, नको-नको! रथों के रथी क्यों नहीं? रागा-रागा कि मसि-मसि? दिल्ली की राजनीतिक चौपड़ पर हर दिन नया थियेटर चालू आहे. तेरह के कैलेंडर की तारीख़ें जैसे-जैसे चौदह की तरफ़ बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे नये-नये गुल और गुलफ़ाम सामने आ रहे हैं. आडवाणी जी को अचानक राममनोहर लोहिया अच्छे लगने लगे तो ‘मौलाना’ मुलायम को श्यामाप्रसाद मुखर्जी सुहाने नज़र आने लगे.
अजीब चकरघिन्नी है भाई!
ऐसा लगता है कि तेरह के इस साल ने सबका तीन-तेरह कर दिया है. मुलायम नये-नये मंतर ढूँढ रहे हैं, काँग्रेस अकबकायी हुई है. नीतिश अपने पाँसे टटोल रहे हैं तो बीजेपी अपने ही तीरों से घायल दिख रही है. अगले चुनावों जैसा अबूझ चुनाव शायद ही देश में कभी हुआ हो. Continue reading