बलात्कार के ख़िलाफ़ चाहिए एक अभियान

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दिल्ली में एक और बर्बर बलात्कार से देश हतप्रभ है. रूह कँपा देनेवाली इस घटना के बाद ग़ुस्सा, हताशा, लाचारगी का एक अजीब भाव हर तरफ़ पसर गया है. किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि बलात्कारियों के बढ़ते दुस्साहस पर लगाम कभी लग भी पायेगी या नहीं. सरकार निकम्मी है, पुलिस और न्यायिक तंत्र लुप्त हो चुका है, समाज सड़ गया है, मनुष्य होने के संस्कार मर चुके हैं या फिर ऐसा क्या है कि क़रीब-क़रीब रोज़ कहीं न कहीं से जघन्य बलात्कार और उस पर संवेदनहीन पुलिस तंत्र की निष्ठुर प्रतिक्रियाओं की दिल दहला देनेवाली कहानियाँ सुनने को मिलती हैं. 16 दिसम्बर के दिल्ली बलात्कार कांड के बाद देश भर में उपजे आक्रोश के बाद जो माहौल बना था, उससे लगा था कि शायद बलात्कार जैसे अपराध के प्रति पुलिस, प्रशासन, न्यायिक मशीनरी, सरकारों और राजनीतिक तंत्र के साथ-साथ समाज और लोगों पर ज़रूर कुछ न कुछ असर पड़ा होगा. लेकिन पिछले तीन महीनों की घटनाओं से स्पष्ट है कि केवल एक क़ानून के अलावा कहीं कुछ भी नहीं बदला.

क़ानून बदलने से क्या होगा अगर क़ानून का पालन कराने का कोई तंत्र हमारे पास न हो. और सिर्फ क़ानून बनाने से क्या होगा अगर हमारी सामूहिक राजनीतिक चेतना सड़कों पर उमड़े जनाक्रोश के तात्कालिक उफान में नहा-धो कर फिर अपनी तंद्रा के अलसाये तम्बुओं में दुबक जाय. हमें यह समझना ही पड़ेगा कि स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा एक ऐसी जटिल सामाजिक समस्या है, जिससे रातोंरात किसी जादुई चिराग़ से ख़त्म नहीं किया जा सकता. इसके लिए सामाजिक-राजनीतिक-प्रशासनिक-न्यायिक सभी मोर्चों पर पूरी ताक़त से एक साथ संगठित और दीर्घकालिक अभियान शुरू करना होगा और उन देशों के अनुभवों से सीख कर आगे बढ़ना होगा जो पुलिस और न्यायिक तंत्र के मामले में हमसे कहीं बेहतर माने जाते हैं और जिन्होंने यौन अपराधों के विरुद्ध ठोस क़दम उठाये हैं.

बात शुरू करने से पहले दुनिया के कुछ विकसित देशों की स्थिति पर नज़र डालते हैं. अमेरिका जैसे देश में भी बलात्कार के सिर्फ 12 प्रतिशत मामलों में ही अभियुक्त की गिरफ़्तारी हो पाती है और केवल 3 प्रतिशत मामलों में ही सज़ा हो पाती है. वहाँ भी बलात्कार के आधे से ज़यादा मामलों में महिलाएं पुलिस से शिकायत नहीं करतीं और केवल 46 प्रतिशत मामले ही पुलिस तक पहुँचते हैं (स्रोत: रेप, एब्यूज़ ऐंड इन्सेस्ट नेशनल नेटवर्क www.rainn.org). ‘क्राइम सर्वे फ़ाॅर इंगलैंड ऐंड वेल्स 2013’ के मुताबिक़ ब्रिटेन में तो बलात्कार के केवल 15 प्रतिशत मामलों में ही महिलाएं पुलिस में शिकायत दर्ज कराती हैं, केवल तीन प्रतिशत मामले अदालत तक पहुँच पाते हैं और केवल एक प्रतिशत मामलों में सज़ा हो पाती है.

ये आँकड़े बहुत चौंकानेवाले हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इनके बहाने हमारी सरकारें और पुलिस तंत्र अपने निकम्मेपन, अपनी संवेदनहीनता और जड़ता का किसी प्रकार बचाव करें. इन आँकड़ों को यहाँ देने का उद्देश्य सिर्फ यह अहसास कराना भर है कि हमारे सामने कैसी कठिन चुनौती है और उससे पार पाने के लिए हमें कितनी मुस्तैदी, कितनी आक्रामकता, कितने जुझारुपन, कितने मनोयोग के साथ कितनी लम्बी लड़ाई लड़नी होगी.

सबसे पहले पुलिस. महिलाओं के विरुद्ध होनेवाले किसी भी अपराध की जाँच एक ख़ास क़िस्म की संवेदनशीलता की माँग करती है. फिर बलात्कार तो एक ऐसा अपराध है, जहाँ पीड़ित और उसके परिजनों पर केवल शारीरिक आघात ही नहीं होता, बल्कि यह हमला उनके समूचे अस्तित्व पर होता है. लेकिन दिल्ली समेत देश भर में आम पुलिसकर्मी इन मामलों में किस तरह की बेशर्मी, कैसी अश्लील संवेदनहीनता, कैसी लिजलिजी मानसिकता और कैसे घिनौने रवैये का दिन-रात प्रदर्शन करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. दिल्ली, मुम्बई से लेकर आप शहरों-क़स्बों में किसी पुलिस थाने में पुलिसकर्मियों से दो-चार बात करके देखिए, आपको साफ़ पता चल जायेगा कि महिलाओं और उनके विरुद्ध होनेवाले अपराधों के बारे में आमतौर पर उनका नज़रिया क्या है. इसका कारण यही है कि हमारे यहाँ नीचे से ऊपर तक पुलिस के प्रशिक्षण का कोई ऐसा ढाँचा नहीं है, जो बदलते सामाजिक मूल्यों, परिवेश और चुनौतियों के सन्दर्भ में उन्हें लगातार तैयार करता रहे. दूसरी बात यह कि पदोन्नति और उनके ‘परफ़ार्मेन्स अप्राइज़ल’ के कुछ पारदर्शी और पूर्वनिर्धारित मानक होने चाहिए, जिससे केवल वही पुलिसकर्मी आगे बढ़ पायें, जिनके विरुद्ध लापरवाही, ढिलाई, लीपापोती या कदाचरण के आरोप न हों. इसी तरह, पुलिस के कामकाज से जुड़े तमाम दूसरे मुद्दे भी हैं, जिनमें राजनीतिक हस्तक्षेप भी एक बड़ा मुद्दा है और कुछ राज्यों में तो इस मामले में भयावह स्थिति है. पुलिस सुधारों को लेकर पिछले पता नहीं कितने बरसों से हम बातें ही बातें करते आ रहे हैं, काम हमने कुछ किया नहीं. जब तक हम पुलिस तंत्र में बुनियादी सुधारों के लिए कुछ नहीं करते, तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा. बस यह ज़रूर होगा कि कभी-कभार किसी बड़ी घटना पर हम दो-चार पुलिसवालों की बलि लेकर अपने घरों में लौट जायेंगे, अगली किसी घटना के होने तक.

दूसरी बात न्यायिक तंत्र. बलात्कार के ख़िलाफ़ कड़ा क़ानून तो बन गया, लेकिन इक्का-दुक्का फास्ट ट्रैक कोर्ट बना देने के अलावा तो न्यायिक व्यवस्था जस की तस लुँज-पुँज है. बरसों-बरस मामले घिसटते रहते हैं. जब तक मुक़दमा लटकता रहता है, पीड़ित परिवार बरसों-बरस एक अन्तहीन त्रासदी से गुज़रता रहता है. जो सज़ा अपराधी को मिलनी चाहिए, उससे कहीं बड़ा दंश पीड़ित और उसका परिवार झेलता है. बहुत बार उसके हौसले भी पस्त हो जाते हैं. न्याय के लिए कोई समयबद्ध सीमा होनी ही चाहिए कि ज़्यादा से ज्यादा दो साल के भीतर निचली अदालत को फ़ैसला सुना ही देना है और अगले दो साल के भीतर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से मामले का निबटारा हो ही जाय. तभी अपराधी को मिले दंड का कोई प्रभाव समाज पर पड़ेगा. वरना बरसों बाद कोई फ़ैसला आता है, तब तक पीढ़ियाँ बदल चुकी होती हैं, परिवार इधर से उधर चले गये होते हैं, लोग पुरानी बातों को भूल चुके होते हैं और किसी के लिए उस फ़ैसले का कोई ज़यादा मतलब नहीं रह जाता.

तीसरी बात यह कि बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा को लेकर एक व्यापक देशव्यापी जनजागरण अभियान चलाये जाने की ज़रूरत है. ख़ासतौर पर छोटी बच्चियों, लड़कियों और महिलाओं को जागरूक किया जाना चाहिए कि वे किस प्रकार भावी ख़तरे को पहचानें और ऐसी किसी भी हरकत से वे किस प्रकार अपना बचाव कर सकती हैं और उन्हें कैसे इस बारे में किसी न किसी को ज़रूर बताना चाहिए.

चौथी बात. कोई ऐसी नोडल राष्ट्रीय एजेन्सी होनी चाहिए, जो केन्द्र और राज्य सरकारों, पुलिस बल और तमाम दूसरी एजेन्सियों से तालमेल रखते हुए और बलात्कार और यौन अपराधों के बारे में कार्ययोजना बनाये, चलाये और समय-समय पर अपनी प्रगति की समीक्षा कर रणनीति तैयार करती रहे. राष्ट्रीय महिला आयोग की निगरानी में यह एजेन्सी काम कर सकती है.

पाँचवी बात. पिछले दिनों सरकार ने कहा था कि वह बलात्कारियों का एक राष्ट्रीय डेटा-बेस तैयार कर एक वेबसाइट पर उनकी तसवीरें लगायेगी. इसे जल्दी से जल्दी लाया जाना चाहिए और तमाम मनचलों और यौन अपराधियों को यहाँ सुशोभित किया जाना चाहिए. इन आरोपों का ब्योरा उनके आधार कार्ड और नागरिक पंजीकरण रजिस्टर से भी जोड़ा जाना चाहिए ताकि एक बार लगा दाग़ कभी धुल न पाये.
(दैनिक हिन्दुस्तान, 24 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित आलेख का मूल पाठ)


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