पाकिस्तान में ख़तरे की नयी घंटी

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पाकिस्तान में ख़तरे की नयी घंटी बजी है. और हो सकता है कि अगले बीस-तीस बरसों में यह हमारे लिए अब तक की सबसे ख़तरनाक और सबसे जटिल चुनौती साबित हो. पाकिस्तान एक जवान देश है, उसकी कुल आबादी में दो-तिहाई हिस्सा उन लोगों का है, जिनकी उम्र अभी तीस साल से कम है. लेकिन बुरी ख़बर यह है कि इन नौजवानों में से 94 प्रतिशत युवा अपने देश की मौजूदा हालत से बेहद निराश हैं और मानते हैं कि उनका देश ग़लत दिशा में जा रहा हैं. यही नहीं, पाकिस्तान के क़रीब 70 प्रतिशत युवा अपने आपको धार्मिक पुरातनपंथी घोषित करते हैं और मानते हैं कि विदेशी विचार, संगीत, फ़िल्म और विदेशी मीडिया के ‘कुप्रभाव’ से युवा पीढ़ी को दूर रखा जाना चाहिए. इनमें से क़रीब 38 प्रतिशत युवा देश में शरीयत के शासन के समर्थक हैं, जबकि 32 प्रतिशत को लगता है कि सैनिक शासन ज़्यादा बेहतर विकल्प है. लोकतंत्र का समर्थन करनेवाले युवाओं की संख्या सिर्फ 29 प्रतिशत है. साफ़ ज़ाहिर है कि पाकिस्तान की आबादी का दो-तिहाई हिस्सा, उसका आम नौजवान प्रगतिशील विचारों, आधुनिक और उदार जीवन शैली, लोकताँत्रिक मूल्यों से कोसों दूर एक ऐसे प्रतिगामी, धर्मान्ध, सामन्ती और रूढ़िवादी वातावरण में जी रहा है, जो एक भयावह भविष्य की ओर ही संकेत करता है. इस युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा शहरी मध्य वर्ग से आता है और चिन्ता की बात है कि उसकी सोच भी ज़्यादा अलग नहीं है.

ये चौंकानेवाले निष्कर्ष अभी हाल में ब्रिटिश काउंसिल की ‘नेक्स्ट जेनरेशन रिपोर्ट 2013’ में सामने आये हैं. ब्रिटिश काउंसिल ने पाकिस्तान के सभी प्राँतों में शहरी और ग्रामीण युवकों और युवतियों के बीच ऐसे सर्वेक्षण की शुरुआत चार साल पहले की थी और 2009 में अपनी पहली रिपोर्ट जारी की थी. चिन्ता की बात यह है कि इन चार वर्षों में पाकिस्तानी युवाओं में आर्थिक मोर्चे पर निराशा और धार्मिक संस्थाओं के प्रति उनके समर्थन में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है. 2009 में केवल 50 प्रतिशत युवा मानते थे कि धार्मिक संस्थाएँ समाज में अपनी सही भूमिका निभा रही हैं, जबकि आज 74 प्रतिशत नौजवान धार्मिक संस्थाओं की भूमिका को सही मानते हैं. इसी तरह, चार साल पहले जहाँ 63 प्रतिशत युवा सेना को सम्मान की दृष्टि से देखते थे, वहीं आज 77 प्रतिशत युवा सेना की साख को अच्छा मानते हैं.

अपने जन्म के बाद से ही सेना, धार्मिक तंत्र और राजनीतिक षड्यंत्रों के कुचक्र में फँसा पाकिस्तान हमेशा से ही लोकतंत्र और उदारवादी सुधारों के लिए एक अंधी सुरंग रहा है. धार्मिक कट्टरता, जिहादी आतंकवाद और तालिबानी सोच की गिरफ़्त में जकड़े इस देश में पहली बार यह चमत्कार हुआ कि तमाम लड़खड़ाहटों के बावजूद किसी चुनी हुई सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया. ऊपर से देखने पर तो थोड़ी उम्मीद दिखती है कि जैसी भी सही, शायद अब बदलाव की शुरुआत हो चली है और लोकतंत्र का पौधा धीरे-धीरे बड़ा और मज़बूत होगा और उसके साथ-साथ दक़ियानूसी सोच की जगह पाकिस्तानी समाज में आधुनिक और प्रगतिशील विमर्श को धीरे-धीरे ही सही, लेकिन जगह मिलने लगेगी.

लेकिन वहाँ की नयी पीढ़ी की ताज़ा रिपोर्ट तो इसके बिलकुल उलट एक बेहद भयावह तसवीर पेश करती है. निष्कर्ष बिलकुल साफ़ है कि लोकतंत्र की विफलता और आर्थिक अँधियारे ने पाकिस्तान की पूरी युवा आबादी को एक ऐसी राह पर डाल दिया है, जिसकी दिशा को मोड़ पाने के लिए अभूतपूर्व राजनीतिक संकल्प और इच्छाशक्ति की ज़रूरत होगी, जिसका फ़िलहाल वहाँ कोई अता-पता नहीं दिखता. केवल दस प्रतिशत पाकिस्तानी युवा ही पूर्णकालिक रोज़गार में हैं, क़रीब एक-तिहाई युवा कुछ छोटा-मोटा काम या दैनिक मेहनत-मज़दूरी करते हैं और युवाओं की आधी आबादी बेरोज़गार है, जिनमें लड़कियों की भारी संख्या है, क्योंकि विवाहित-अविवाहित युवा लड़कियों में क़रीब 86 प्रतिशत घर की चहारदीवारी में ही रहती हैं और जो भविष्य में भी घर के भीतर ही रहेंगी. इनमें से सत्तर प्रतिशत लड़कियाँ घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. केवल दस प्रतिशत युवा ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें से ज़्यादातर शहरी लड़के हैं.

यह सारी बातें इसलिए बहुत गम्भीर हो जाती हैं कि इतने गहरे धार्मिक आग्रहों और पुरातनपंथी सामाजिक संरचना में जकड़े वहाँ के युवाओं के सामने अच्छे आर्थिक अवसर न के बराबर हैं, दूसरे इनके पास ऐसी कोई खिड़की नहीं है, जिससे नये विचारों की उजास मिल सके, तीसरी बात यह कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था से न तो युवाओं को कोई आशा है और न ही ऐसा लगता है कि इस साल मई में होनेवाले आम चुनावों के बाद कोई ऐसी सरकार आयेगी, जो इस युवा-शक्ति की ऊर्जा को सही दिशा दे सकेगी या देना चाहेगी. ख़ास तौर से तब, जबकि धारा 62 और 63 के तहत इन चुनावों में नामांकन पत्रों की जाँच इस आधार पर भी की जा रही है कि उम्मीदवार नमाज़ी है या नहीं और वह इसलाम के धार्मिक नियमों-कर्तव्यों का पालन करता है या नहीं. राजनीतिक कार्यकलाप पर धर्म के इस अवाँछित वर्चस्व की प्रयोगशाला से जो भी सरकारनुमा चीज़ निकल कर बाहर आयेगी, वह कितने खुले ख़यालों और सुधारों की पक्षधर होगी, यह बात आसानी से समझी जा सकती है.

इसी सन्दर्भ में अभी एक और ताज़ा रिपोर्ट सामने आयी है. ‘वेस्ट प्वाइंट’ ने पाकिस्तान के कुख्यात आतंकवादी संगठन लश्कर ए तैयबा के नौ सौ मारे जा चुके आतंकवादियों के जीवन वृत्त का अध्य्यन कर कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण तथ्य पेश किये हैं. इसके अनुसार आमतौर पर 16 साल की उम्र में एक युवा लश्कर में भर्ती होता है और 21 साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते वह किसी न किसी आॅपरेशन में मार दिया जाता है. चौंकानेवाली बात यह है कि इनमें से क़रीब आधे आतंकवादियों की पढ़ाई मदरसों के बजाय सामान्य स्कूलों में हुई होती है और इनके परिवार इन्हें ख़ुशी-ख़ुशी आतंकवादी बनने और ‘जिहाद में शहीद होने’ के लिए भेजते हैं.
धर्मांन्धता के ऐसे पर्यावरण में जहाँ लश्कर जैसे संगठनों को इस प्रकार की सामाजिक स्वीकृति मिली हुई हो, जहाँ के एक बड़े भूभाग पर तालिबानियों की हुकूमत चलती हो, जहाँ ईशनिन्दा क़ानून के कुछ प्रावधानों की आलोचना करने के कारण पंजाब प्राँत के गवर्नर सलमान तासीर और धार्मिक अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज़ भट्टी की सरेआम हत्या हो जाय और लोग हत्यारों का सम्मान करें, वहाँ की नौजवान आबादी की ताज़ा तसवीर सचमुच बहुत डरावने संकेत देती है. भारत के लिए चिन्ता की बात यह है कि अगर पाकिस्तान में ज़मीनी स्थितियाँ तेज़ी से न सुधरीं (जिसके कोई आसार फ़िलहाल नहीं दिखते), तो अगले बीस वर्षों में वहाँ से निर्यात किया जानेवाला आतंकवाद हमारे लिए बहुत बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है, क्योंकि आर्थिक अंधी गली में फँसी हताश-निराश युवा ऊर्जा को धार्मिक उन्माद का मद बड़ी आसानी से अपना शिकार बना लेता है.
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(दैनिक हिन्दुस्तान, 10 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित)


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