तीन तेरह में चौदह का गणित

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पल-छिन, पल-छिन, धक-धक, धुक-धुक! नमो-नमो, नको-नको! रथों के रथी क्यों नहीं? रागा-रागा कि मसि-मसि? दिल्ली की राजनीतिक चौपड़ पर हर दिन नया थियेटर चालू आहे. तेरह के कैलेंडर की तारीख़ें जैसे-जैसे चौदह की तरफ़ बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे नये-नये गुल और गुलफ़ाम सामने आ रहे हैं. आडवाणी जी को अचानक राममनोहर लोहिया अच्छे लगने लगे तो ‘मौलाना’ मुलायम को श्यामाप्रसाद मुखर्जी सुहाने नज़र आने लगे.
अजीब चकरघिन्नी है भाई!
ऐसा लगता है कि तेरह के इस साल ने सबका तीन-तेरह कर दिया है. मुलायम नये-नये मंतर ढूँढ रहे हैं, काँग्रेस अकबकायी हुई है. नीतिश अपने पाँसे टटोल रहे हैं तो बीजेपी अपने ही तीरों से घायल दिख रही है. अगले चुनावों जैसा अबूझ चुनाव शायद ही देश में कभी हुआ हो.
बीजेपी में घमासान इस पर है कि पार्टी में किस ‘लाल’ की गोटी लाल हो? नमो भाई यानी गुजरात की धरती के तीसरे लाल (जैसा कि राजनाथ जी बता गये कि गुजरात की धरती से सरदार पटेल न उठ खड़े हुए होते तो भारत आज ‘अखंड’ न होता और गुजरात की धरती के दूसरे लाल महात्मा गाँधी के सपनों का भारत बनाने के लिए गुजरात की धरती के एक और लाल, नमो भाई नरेन्द्र मोदी को ही देश का क़र्ज उतारना है) की लाली बीजेपी के कई महारथियों को क़तई रास नहीं आ रही है. इन सभी महारथियों के रथी और छह-छह रथ-यात्राओं की जुगाली कर रहे लालकृष्ण आडवाणी मुलायम और लोहिया के क़सीदे पढ़ते हुए अचानक अयोध्या कांड का पाठ करने लग गये! क्योंकि अगर मोदी आ गये तो फिर इन महारथियों की औक़ात इतनी भी नहीं रह जायगी कि वे मोदी के रथ में पहियों की तरह भी काम आ सकें.
उधर, युवराज राग गा रहे काँग्रेसी अचानक अचकचा गये हैं कि ‘रागा’ यानी राहुल गाँधी की तान ठीक रहेगी या ‘मसि’ यानी मनमोहन सिंह की लिखी कहानी का ही तीसरा संस्करण छापने की जुगत भिड़ायी जाय. हाथ वालों को वह हाथ नहीं सूझ रहा है, जिसे थाम कर वे चुनावी वैतरणी की तरफ़ बढ़ें? इत्ती दुविधा क्यों है बन्धु?
बीजेपी और आरएसएस को तो कोई दुविधा अब तक नहीं थी. उन्हें तो लग रहा था कि इस बार मोदी के ‘सुदर्शन चक्र’ से वे मैदान मार लेंगे. और सच कहें तो बीजेपी और संघ के पास मोदी से बेहतर कोई और पत्ता है ही नहीं. सब जानते हैं कि मोदी की तमाम सीमाएँ हैं, अंतर्राष्ट्रीय मंचों से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक, तरह-तरह के सवाल हैं. ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन की तरफ़ से तो दरवाज़े खुल गये, लेकिन अभी बहुत-कुछ बाक़ी है. अमेरिका का रुख़ नरम पड़ भी जाय तो अरब देशों के साथ सम्बन्ध कैसे होंगे, इसका कोई संकेत अब तक नहीं मिला है. राष्ट्रीय राजनीति में भी सवाल बने ही हुए थे. नीतिश कुमार तो पहले से ही लाल झंडी दिखा रहे हैं, लेकिन चुनावों के बाद अगर सहयोगियों की ज़रूरत पड़ी (जोकि पड़ेगी ही), तो नये सहयोगी कहाँ से आयेंगे. एक जयललिता को मोदी अपने पाले में गिन सकते हैं, लेकिन क्या ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, जगन रेड्डी या चन्द्रबाबू नायडू, मुलायम या मायावती में से कोई मोदी का कमल खिलाने को तैयार होगा? ये सारे सवाल थे, इसके बावजूद संघ अगर मोदी को अपना ‘ब्रह्मास्त्र’ मान रहा था, तो वह कुछ भी ग़लत नहीं सोच रहा था. मोदी के अलावा आज बीजेपी के पास ऐसा कौन-सा नेता है, जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ कर पार्टी उम्मीद कर सके कि कम से कम वह इतनी सीटें तो जीत सके, जितनी इस लोकसभा में उसके पास हैं.
यही कारण है कि तमाम असहजताओं के बावजूद संघ के लिए मजबूरी का नाम मोदी है. मोदी के पास कम से कम तीन बड़े हथियार हैं, जिनसे संघ को बड़ी उम्मीदें हैं. पहला विकास, दूसरा हिन्दुत्व की अन्तर्निहित छवि (जिसके लिए मोदी को किसी नये हिन्दुत्ववादी नारे की ज़रूरत नहीं है) और तीसरा ‘दबंग’ नेता के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकनेवाला व्यक्तित्व. यहाँ तक तो सब ठीक था, लेकिन पार्टी के बाक़ी नेताओं को जो बात पच नहीं रही है, वह है मोदी का ‘मैं’ और ‘मेरे सिवा कोई नहीं.’ मोदी पिछले दस सालों से गुजरात में बीजेपी और संघ को जेब में रख कर टहलते रहे हैं. किसी को उन्होंने कभी कुछ नहीं समझा. पार्टी का जो भी नेता कभी गुजरात गया, वह मोदी की दया पर ही वहाँ रहा. ऐसे में मोदी अगर राष्ट्रीय राजनीति में आते हैं तो सबको डर है कि वह बाक़ी दिग्गजों को एक-एक कर ठिकाने लगा देंगे और यह डर बेबुनियाद भी नहीं. जैसे-जैसे पार्टी के बाक़ी नेताओं को इस ‘ख़तरे’ का एहसास होता गया, वैसे-वैसे मोदी के दिल्ली कूच को रोकने की कोशिशें शुरू हो गयीं. और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संघ, बीजेपी और मोदी इस नयी चुनौती से कैसे निपटें? इस बात की क्या गारंटी है कि मोदी के नेतृत्व में अगर चुनाव लड़ा गया तो पार्टी में बड़े पैमाने पर अन्तर्घात नहीं होगा? अब बीजेपी की सबसे बड़ी धुकधुकी यही है.
उधर, काँग्रेस में भी सम्भवतः सहसा ही कोई आत्मबोध हुआ लगता है कि चुनावी शतरंज में ‘ रागा’ यानी राहुल गाँधी को राजा की तरह उतारा जाय या नहीं? अगर उन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करते हुए काँग्रेस चुनाव लड़ती है तो इससे दो बड़े ख़तरे हैं. पहला यह कि लड़ाई मोदी बनाम राहुल हो सकती है, जो नाक की लड़ाई बन सकती है. दूसरा यह कि नतीजे अगर कहीं बिहार और उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों की तरह ही ख़राब आ गये तो युवराज की बड़ी छीछालेदर होगी. इसलिए मजबूरी का नाम ‘मसि’ यानी फ़िलहाल मनमोहन सिंह की पर्ची लेकर चलिए, आगे की बात चुनाव बाद देखी जायगी! राहुल या मनमोहन सिंह– काँग्रेस की धुकधुकी यही है. और मुलायम और नीतिश टकटकी लगाये देख रहे हैं, आगे-आगे होता है क्या?
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(अमर उजाला, 9 अप्रैल 2013 के अंक में प्रकाशित)


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