बताइए, आपको कौन-सी जीत चाहिए?

Posted on November 19, 2013
आप जीतना चाहते हैं! भला कौन ऐसा होगा, जो जीतना न चाहे? हर कोई चाहता है कि वह जीते और हमेशा जीतता रहे. लेकिन क्या सभी जीत सकते हैं? क्या यह सम्भव है कि युद्ध में या खेल में, संघर्ष में या विमर्श में सभी जीत जायें! नहीं सम्भव है न! क्योंकि सब जीत नहीं सकते. एक जीतेगा, तो दूसरा हारेगा! किसी की हार के बिना कोई जीत सम्भव नहीं. जीतने में ही निहित है किसी का हारना, किसी को हराना! अब यह जीत- हार किसी की भी हो सकती है, किसी व्यक्ति की, किसी राष्ट्र की, किसी विचार की, किसी अवधारणा की, किसी व्यवस्था की, किसी परम्परा की, किसी रूढ़ि की, किसी स्थिति की, किसी प्रवृत्ति की. प्रवृत्ति जैसे असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय, स्थिति जैसे प्रकृति पर मनुष्य की विजय! कँटीले जंगलों और पत्थर के हथियारों से शुरू होकर आज कंक्रीट के शहरों और परमाणु हथियारों तक मानव की यात्रा दुरूह, विकट और असम्भव-सी लगनेवाली सतत विजय-गाथाओं का एक निरन्तर महाकाव्य है.
लेकिन संसार की यह शाश्वत नैसर्गिक इच्छा रही है कि जो अच्छा हो वही जीते. जो हितकर हो, जो कल्याणकारी हो, वही जीते. आप आदिम इतिहास से लेकर अब तक की मानव सभ्यता की यात्रा और संघर्षों पर नज़र डालें, तो पायेंगे कि तमाम प्रवृत्तियों के असंख्य युद्धों में हिटलर से हिरोशिमा तक कुछेक गिनती के अपवादों को छोड़ कर अगर अन्ततः अच्छाई की विजय न हुई होती, तो संसार आज इतना विकसित, इतना सभ्य, इतना व्यवस्थित न होता और चुटकी भर भी लोकतांत्रिक न हो पाता. और गिनती के जिन अपवादों में कुख्यात व्यक्तियों और प्रवृत्तियों को तात्कालिक विजय मिली भी, उन्हें भी अन्ततः कुछ वर्षों की सत्ता और वर्चस्व के बाद पराजित हो कर इतिहास के क़ब्रिस्तान में दफ़न होना पड़ा. निष्कर्ष क्या है? यही कि समय कैसा भी रहा हो, युग कोई भी हो, परिस्थितियाँ कैसी भी रही हों, शुरू में, और हो सकता है कुछ वर्षों तक कोई भी जीतता हुआ दिखा हो, लेकिन अन्तिम विजय उसी की हुई, जिसके जीतने की प्रबल इच्छा मनुष्य की सामूहिक विश्व चेतना ने की. अन्ततः वही जीता, जिसे मानव समाज और संसार के व्यापक हित में जीतना चाहिए था!
आज के समय में, जब जीत को जीवन के नये महामंत्र के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जीत के इस बुनियादी सूत्र को समझना बेहद महत्त्वपूर्ण है कि जीत वह है, जिससे कुछ अच्छा होता हो, जिससे कोई ऐसा बदलाव हो जो पहले से कुछ अच्छा हो. हमारे हज़ारों बरसों के इतिहास का निचोड़ यही है. आप कल्पना करें कि अगर अब तक हमेशा बुराइयाँ जीत रही होतीं तो आज हमारी दुनिया कैसी होती? क्या यह दुनिया रह पाने लायक़ होती? क्या हम यह संवाद भी कर पाने की स्थिति में होते? हम चैन से जीते रहें, इसके लिए अच्छाइयों का जीतना ज़रूरी है. यही मनुष्य की चेतना का मूल उद्घोष है कि जो अच्छा हो, वह विजयी रहे. ज़रूरी है कि जीत से कुछ अच्छा घटित हो, कुछ अच्छा मिले, हमें भी, हमारे समाज को भी, हमारे देश को भी, संसार को भी.
लेकिन आज जिस ‘जीत’ की सबको घुट्टी पिलायी जा रही है, वह जीत नहीं, बल्कि होड़ है. जीत और होड़ में एक महीन लेकिन बड़ा बुनियादी फ़र्क़ है, जिसे या तो लोग भूल गये हैं या फिर उन्हें मालूम ही नहीं है. होड़ हमेशा दूसरों से आगे निकलने की होती है. होड़ हमेशा दूसरों से पहले कुछ पा लेने की, कुछ झटक लेने की होती है. होड़ यह नहीं देखती कि जो पाया गया, वह कैसे पाया गया? उसका एक ही नियम है कि चाहे जैसे भी, बल से या छल से जो भी हासिल कर सकते हो, कर लो. दुर्भाग्य से आज होड़ में आगे रहने को ही लोग जीत मानने लगे हैं. और जीत का मतलब यही समझा जाता है कि होड़ में दूसरों को पछाड़ो, अपनी जगह बनाओ, सही या ग़लत कैसे भी!
होड़ या तथाकथित जीत की इस अदम्य चाह को हम जीवन में जगह-जगह घटते देखते हैं, स्कूल के क्लासरूम से लेकर कारपोरेट मैनेजमेंट और टीवी के रियलिटी शो से लेकर सड़क और अपार्टमेंट की लिफ़्ट तक. कभी आपने नोटिस किया है कि लिफ़्ट में चाहे जितनी भी जगह हो, उसमें से बाहर आनेवालों का इन्तज़ार किये बिना हम क्यों लिफ़्ट में घुसने की आपाधापी में रहते हैं? क्या हम नहीं जानते कि लिफ़्ट में से कुछ लोग बाहर आयेंगे, तो भीतर हमारे लिए और जगह बनेगी? जानते तो हैं, लेकिन इसका क्या भरोसा कि उस फ़्लोर पर कुछ लोग लिफ़्ट से बाहर आयेंगे ही? अगर वे बाहर न आये तो? इसलिए पहले अन्दर घुस कर अपनी जगह सुरक्षित कर लो, फिर जिसे बाहर जाना हो जाये, जिसे अन्दर आना हो आये! अपार्टमेंट की लिफ़्ट का उदाहरण इसलिए कि आमतौर पर उसमें ऐसी भीड़ नहीं होती कि लोगों को अन्दर जगह न मिले. फिर भी हम सबसे पहले उसमें अपनी जगह बनाने की होड़ में रहते हैं. क्यों? इसलिए कि हमारा अवचेतन हमें लिफ़्ट का ‘युद्ध’ जीतने के लिए ठेलता है.
लेकिन न कोई हमें बताता है और न हम कभी महसूस कर पाते हैं कि जीवन के हर पल हम ‘लिफ़्ट के युद्ध’ जैसी जो असंख्य ‘विजय’ प्राप्त कर ख़ुश होते रहते हैं, क्या वाक़ई वह जीत है? क्या हमने कभी सोचा कि इस ‘जीत’ से क्या अच्छा हुआ? यही न कि आप दूसरों को पीछे छोड़ कर कुछ पहले लिफ़्ट में घुस गये. कुछ दूसरे लोग जो आपके मुक़ाबले ज़्यादा शिष्ट थे (या कहें कि फिसड्डी थे), आपसे कुछ पल बाद लिफ़्ट में आये. आपने वहाँ पहले पहुँच कर क्या पाया और उन्होंने कुछ पल बाद लिफ़्ट में पहुँच कर क्या खोया? गये तो सब एक ही लिफ़्ट में! चलिए पल भर को मान लें कि यह लिफ़्ट किसी अपार्टमेंट की नहीं, बल्कि एक भीड़ भरे दफ़्तर की है. हो सकता है  कि आप ठेलमठेल कर पहले लिफ़्ट में घुस गये, बाक़ियों को जगह नहीं मिली और वे अगली लिफ़्ट में आये. यहाँ भी एक-दो मिनट पहले अपने गंतव्य पर पहुँच कर आपने क्या पाया और दूसरों ने एक-दो मिनट बाद पहुँच कर क्या खोया?
यह होड़ सब जगह है. कारपोरेट कम्पनियों में किसी तरह औने-पौने मुनाफ़ा कमाने की होड़ है. जिसका सबसे बड़ा मुनाफ़ा, वह सबसे सफल कम्पनी! लेकिन अकसर यह मुनाफ़ा बढ़ाया कैसे जाता है? अकसर लागत घटा कर, घटिया कच्चा माल लगा कर, या पैकिंग में भरी गयी चीज़ का वज़न घटा कर! कुछ दिनों पहले मेरा घरेलू प्रिंटर ख़राब हो गया. कभी 7-8 साल पहले ख़रीदा था. सोच रहा था कि यह अब कबाड़ हो गया, इतना पुराना है, इस बीच तकनालाॅजी कितनी बदल चुकी है. बहरहाल, बनवाने ले गया. सर्विस सेंटर पर मेकेनिक से यों ही पूछा कि कहीं कोई एक्सचेंज आॅफ़र चल रहा है क्या? इसे बदल कर नया ले लूँ. वह फ़ौरन बोला कि जब तक यह चल रहा है, चलाते रहें. आजकल जो नये चमकीले-दमकीले माॅडल आ रहे हैं, उनमें तो कोई जान नहीं है. यही अनुभव बारह-तेरह साल पुराने माइक्रोवेव ओवन का है. मेकेनिक कहता है कि इसे बनवाते रहो और चलाते रहो. नया ख़रीदोगे तो पछताओगे! क्यों भई, आज जब तकनालाॅजी इतनी आगे बढ़ चुकी है, तो इन चीज़ों की क्वालिटी साल दर साल क्यों गिर रही है? इसीलिए कि क्वालिटी ख़राब होगी तो लागत कम होगी, मुनाफ़ा बढ़ेगा. फिर दस-बारह साल चलने के बजाय चीज़ जल्दी कबाड़ हो जायेगी और ग्राहक को अपेक्षाकृत जल्दी-जल्दी नयी चीज़ें ख़रीदनी पड़ेंगी, जिससे कम्पनी का उत्पादन बढ़ेगा और मुनाफ़ा भी. एक दिन मेरी पत्नी ने बिस्कुट का पैकेट ख़रीदा. हमेशा वही बिस्कुट घर में इस्तेमाल होता है. दाम तो वही पुराना था, पैकिंग में भी कोई अन्तर नहीं था. फिर भी उन्हें कुछ खटक रहा था. अचानक उन्होंने उसके वज़न पर नज़र डाली. वज़न कुछ ग्राम कम हो गया था. पैकेट में बिस्कुटों की संख्या उतनी ही थी, दाम भी वही, लेकिन बिस्कुटों का कुल वज़न घटा कर मुनाफ़ा बढ़ाने की चाल चली गयी. फिर चाय की पत्ती के साथ भी यही माजरा हुआ. यानी चोरी से मुनाफ़ा बढ़ा लो!
अपने हिसाब से ये कम्पनियाँ मुनाफ़े के ‘टारगेट’ की दौड़ में जीत रही हैं, लेकिन अरबों रुपये अपने लुभावने विज्ञापनों पर लुटा देने के बावजूद ग्राहक का दिल जीतना इनके ‘टारगेट’ में कहीं है ही नहीं! अब ज़रा अस्पतालों की बात कर लें. भव्य इमारतें, अत्याधुनिक उपकरण, नामी-गिरामी डाॅक्टरों की लम्बी-चौड़ी टीम, लेकिन वहाँ भी डाॅक्टरों के लिए ‘टारगेट’ तय है कि उन्हें हर महीने इतनी कमाई अस्पताल के लिए जुटानी होगी! वे ‘टारगेट’ कैसे पूरा करते हैं, वे जानें! इसलिए अब किसी भी अस्पताल पर विश्वास नहीं होता कि वह मरीज़ से जो पैसा ले रहा है और जो निदान सुझा रहा है, वह कितना सही है. अस्पताल को नाम, साख और सम्मान कमाने की फ़िक्र बिलकुल नहीं है, मुनाफ़ा दिन दूना, रात चौगुना बढ़ना चाहिए. यही हाल मीडिया का है, बाज़ारवाद और पेड न्यूज़ जैसी बुराइयों के चलते उसकी साख हाल के बरसों में लगातार गिरी है. शिक्षण संस्थान भी अन्धाधुन्ध मुनाफ़े की फ़ैक्ट्रियों में बदल चुके हैं. 
ये सब इनके अपने मुताबिक़ जीत रहे हैं. दूसरों को ठेहुनी मारते ठेलते-ढकेलते आगे तो बढ़ रहे हैं, लेकिन क्या इससे कुछ अच्छा हो रहा है? अगर अच्छा हो रहा होता तो चारों तरफ़ इतनी निराशा, इतनी नकारात्मकता क्यों होती? जीत का मूलमंत्र है कि हर जीत से प्रेरणा मिलनी चाहिए. लेकिन आज हर एक जीत  अपने पीछे हज़ारों हारे हुओं की क़तार क्यों ढो रही है? आप कहेंगे, भला इसमें क्या हैरानी? जब हज़ारों की भीड़ में किसी एक को ही जीतना है तो पराजितों की क़तार हज़ारों में ही तो होगी. बिलकुल सही कह रहे हैं आप! लेकिन ज़रा ध्यान दें. एक जीत ऐसी होती है जो हज़ारों लोगों को, और हारनेवालों तक को जीत सकने की प्रेरणा देती है, जो सिखाती है कि ऐसा कुछ नहीं है, जिसे जीता न जा सके, बस लगन हो, संकल्प हो, तैयारी हो, मेहनत हो तो दुनिया में कुछ भी जीता जा सकता है. ऐसी जीत किसी को हराती नहीं, बल्कि हारनेवालों में भी आशा का संचार करती है, अकसर उन्हें बड़ा, और बड़ा सपना देती है. और दूसरे क़िस्म की जीत वह होती है, जो अगर किसी को किसी चीज़ के लिए प्रेरित करती है, तो बस बेईमानी करने के लिए! वह हज़ारों हारनेवालों में अवसाद भरती है, ‘फिसड्डी’ होने की लाचारी, अविश्वास और असुरक्षा पैदा करती है. उनके करियर, जीवन, और भविष्य पर संकट खड़ा करती है. निराशा के घटाटोप को फैलाती-बढ़ाती है. अब बताइए, आपको कौन-सी जीत चाहिए?
भाई, ज़रा मिनट भर रुक कर देखें और सोचें कि जिस दौड़ में आप अपना सब कुछ दाँव पर लगा रहे हैं, वह आपको क्या देगी? आप अगर सबसे आगे हुए भी तो भी वह जीत नहीं है. वह वैसा ही है, जैसे लिफ़्ट में दूसरों से पहले घुस जाना. उससे आप पाते कुछ नहीं हैं, बस दूसरों को यह नकारात्मक एहसास कराते हैं कि सही तरीक़े से कोई आगे नहीं बढ़ सकता! ऐसी होड़ अन्ततः आत्मघाती ही होगी, इससे समाज में जो नकारात्मकता, निराशा और कुंठा उपजेगी, उसकी लपटों से आप भी अछूते नहीं रहेंगे, चाहे आप दूसरों से कितना ही आगे क्यों न निकल गये हों. इसलिए पहले समझिए कि जीत किसे कहते हैं और तब जीत के लिए निकलिए, जग जीतिए और दूसरों को प्रेरित कीजिए कि वे भी नया जग जीतें.
(लोकमत समाचार, नवम्बर 2013)

No Replies to "बताइए, आपको कौन-सी जीत चाहिए?"


    Got something to say?

    Some html is OK