नमो के विकास का तिलिस्म

Posted on July 21, 2013
जलेबी छन रही है और दिमाग़ घूम रहा है. चाशनी विकास की है, घी ‘इंडिया फ़र्स्ट’ मार्का ‘सेकुलरिज़्म’ का है, जलेबी छाननेवाला कपड़ा ‘पिछड़े’ थान का है, कड़ाही सरदार पटेल छाप ‘राष्ट्रीय एकता’ के लोहे की है, आग हिन्दुत्व की है और हलवाई ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ है!
पिछले क़रीब साल भर से बीजेपी अपनी राजनीति का जो तिलिस्मी मंतर ढूँढ रही थी, उसकी शक्ल अब काफ़ी कुछ साफ़ होने लगी है. इसमें मुसलमानों के लिए विज़न डाक्यूमेंट भी है, और उसकी काट के लिए ‘ कुत्ते के पिल्ले’ का मुहावरा भी है, युवाओं और कारपोरेट को रिझाने के लिए विकास का ‘पाॅवर प्वाइंट प्रेज़ेंटेशन’ है तो पिछड़ों के लिए ‘चाय बेचनेवाले पिछड़ी जाति के एक बालक’ के तमाम काले पहाड़ों को लाँघ कर ‘महाविजेता’ बन जाने की एक ‘मर्मस्पर्शी और प्रेरणादायक’ कहानी भी है. अपने परम्परागत मतदाताओं के लिए राम मन्दिर, हिन्दुत्व और अब हिन्दू राष्ट्रवाद का भगवा ध्वज भी है, चीन और पाकिस्तान को नाकों चने चबवा देने के लिए ‘पटेलवाला लोहा’ भी है, तो अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हामी भराने के लिए ख़ास तौर पर ‘कस्टमाइज़्ड सेकुलरिज़्म’ का मुखौटा भी है.
हमारे बचपन में काग़ज़ और सेलुलाइड के मामूली-से खिलौने हुआ करते थे और हम उन्हीं टटपुंजिया-से खिलौनों से ख़ुश हो लिया करते थे. मुझे याद है तब काग़ज़ का एक खिलौना हमें बड़ा जादुई-सा लगता था. वह छपा हुआ एक चित्र हुआ करता था. एक तरफ़ से देखो तो ‘चोटी वाले पंडित जी’ दिखते थे और उसे उलट कर देखो तो ‘दाढ़ी वाले मुल्ला जी’ नज़र आने लगते थे. ऐसे ही एक और खिलौना होता था, जिसमें अलग-अलग कोणों पर छोटे-छोटे दर्पण लगे होते थे और अन्दर कई रंगों की चूड़ियों के टूटे हुए टुकड़े भरे होते थे, उसे जब हिला कर देखिए, अन्दर चूड़ियों के टुकड़ों से हर बार नयी डिज़ाइन बन जाया करती थी. बीजेपी भी इस बार कुछ-कुछ ऐसा ही, कई-कई मुखों वाला ‘नमो विकास तलिस्मान’ गढ़ रही है. इसकी ख़ासियत यह होगी कि इसे आप जिधर-जिधर से देखेंगे, विकास अलग डिज़ाइन का, अलग रंग का, आपकी पसन्द का दिखने लगेगा!
दरअसल, बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मानना है कि 2014 का चुनाव उनके लिए जाने-अनजाने ही ‘अभी नहीं, तो कभी नहीं’ की एक अभूतपूर्व स्थिति लेकर उपस्थित हो रहा है. ज़रा आज की तुलना कीजिए 1991- 1996 के नरसिंह राव के दौर से. राम जन्मभूमि आन्दोलन की परिणति के तौर पर 1992 में बाबरी मसजिद ध्वस्त हो चुकी थी. अयोध्या प्रकरण ही नहीं, बल्कि अपने पूरे कार्यकाल में नरसिंह राव सरकार तमाम दूसरे मुद्दों पर भी अकर्मण्यता के कारण बदनाम रही. भ्रष्टाचार के कई बड़े मामले सामने आये और ख़ुद नरसिंह राव भी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे. काँग्रेस में राव को लेकर विरोध चरम पर पहुँच गया और अन्ततः अर्जुन सिंह और नारायणदत्त तिवारी के नेतृत्व में 1995 में विरोधियों का एक धड़े ने अलग पार्टी बना ली. सच तो यह है कि 1996 में स्थिति आज से कहीं ज़्यादा ख़राब थी. आज मनमोहन सरकार को लेकर जनता में जो नकारात्मक छवि बनी है, ठीक उन्हीं स्थितियों में तब राव सरकार दिख रही थी, लेकिन तब चुनाव के ठीक पहले काँग्रेस टूट चुकी थी और बाबरी मसजिद को गिरा देने के बाद बीजेपी का उत्साह बढ़ा हुआ था. इसके बावजूद बीजेपी कुल 161 सीटें ही जीत पायी. अटल जी तेरह दिन के प्रधानमंत्री बने और फिर देवेगौड़ा-गुजराल युग में सरकार दो साल तक घिसटी.1998 और 1999 के दोनों चुनावों में बीजेपी ने 182 सीटें जीतीं. कारण यही था कि लोग देवेगौड़ा-गुजराल युग की अधर में अटकी सरकारों से बेहतर विकल्प चाहते थे और काँग्रेस के पास उस समय कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं था. इसलिए बीजेपी कुछ ख़ास किये बिना भी ‘लाचारी’ के एक विकल्प के तौर पर उभरी.
आज बीजेपी को ठीक 1996 की स्थितियाँ दिख रही हैं. सरकार की छवि ख़राब है, बिलकुल राव सरकार की तरह. काँग्रेस में 1996 जैसा संकट तो नहीं, लेकिन नेतृत्व को लेकर उहापोह है. राहुल गाँधी को आग के दरिया में झोंक दिया जाय या नहीं, यह बड़ा सवाल उसके सामने है. विकास की गति धीमी पड़ जाने, महँगाई बढ़ते जाने, हर मोर्चे पर सरकार के ‘ढीले-ढाले-से’ दिखनेवाले रवैये, भ्रष्टाचार समेत सभी बड़े मुद्दों प्रधानमंत्री की ‘किंकर्तव्यविमूढ़ता’ की स्थिति से उपजी निराशाओं के बीच बीजेपी को अगर लगता है कि वह अपने नमो ब्रह्मास्त्र से मैदान मार लेगी, तो उसकी ‘हाइपोथीसिस’ अपनी जगह ग़लत नहीं है.
1996 में बीजेपी के पास सिर्फ एक कुंजी थी, राम मन्दिर की. और वह तब के अनुभवों से सबक़ लेकर सिर्फ एकमुँही चाबी पर दाँव नहीं लगाना चाहती. उसे चाहिए ऐसी ‘मास्टर की’ जिसमें तरह-तरह के करतब भरे पड़े हों. इस बार बीजेपी कम से कम 1998-99 के 182 सीटों के आँकड़े को तो कैसे भी पाना चाहेगी. और यह आँकड़ा आयेगा कहाँ से? उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और उत्तराखंड से ही वह कुछ सीटें बढ़ा सकती है, जहाँ उसका खाता पिछले चुनाव में बहुत ख़राब था. कुछ सीटें वह मध्यप्रदेश, बिहार और गुजरात से बढ़ा लेने की रणनीति बना सकती है. बस.
इसलिए उत्तर प्रदेश का क़िला भेदने के लिए अमित शाह की तैनाती के साथ हिन्दुत्व की बाँग लगायी गयी है और नरेन्द्र मोदी ने अपने आपको ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ बता दिया है. उधर, विश्व हिन्दू परिषद ने 25 अगस्त से 13 सितम्बर तक अयोध्या में 84 कोसी परिक्रमा की घोषणा कर ही दी है. यह यूपी का गेमप्लान हुआ, जिसका लाभ राजस्थान, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश और गुजरात में मिल सकता है. लेकिन बिहार में हिन्दुत्व के बजाय नरेन्द्र मोदी के पिछड़ा होने का कार्ड खेला जायेगा तो देश के बाक़ी हिस्सों में ‘नमो तलिस्मान’ का जो कोण जहाँ फ़िट होगा, वहाँ उसे दिखाया जायेगा. तो अब जाकर अपने दिमाग़ की बत्ती भी जल गयी कि जो जलेबी छन रही है, उसका मतलब क्या है और अब यह भी आराम से कहा जा सकता है कि अगर नीतिश कुमार बीजेपी के साथ बने रह गये होते तो ख़ासे बेवक़ूफ़ बने होते.
(अमर उजाला के 16 जुलाई 2013 के अंक में प्रकाशित)

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