नमोरथ का मनोरथ : 2014 या उससे आगे?

Posted on September 16, 2013
हरा समंदर, गोपी चन्दर, बोल मेरी मछली कितना पानी. जुमे का दिन हो, कुरता भगवा के बजाय हरा हो और बीजेपी में एक ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ का राजतिलक हो रहा हो! है न कुछ अटपट! ममता बनर्जी भी जुमे को मुख्यमंत्री पद की शपथ लें और नरेन्द्र मोदी भी पार्टी में अपनी ताजपोशी के लिए जुमे का दिन ही चुनें, कुरता भी हरियाला हो जाए, जनसभाओं में बुर्क़ों और जालीदार गोल टोपियों की नुमाइश लगायी जाए तो बेचारी मछली को पानी की थाह तो लेनी ही पड़ेगी!
‘धर्मनिरपेक्षता के बुर्क़े’ से शुरू होकर अपनी सभाओं में ‘ख़रीदे गये बुर्क़ों की छटा बिखेरने’ तक नमोरथ को अपना मनोरथ पाने के लिए अभी न जाने क्या-क्या फट्टे-फच्चर कहाँ-कहाँ जुगाड़ने-उखाड़ने, काटने-पीटने और ठोकने-ठाकने पड़ेंगे, जाने कितने मुखौटे बदलने पड़ेंगे, जाने किस-किस रंग के कुरते पहनने पड़ेंगे! लेकिन फ़िलहाल तो सबसे बड़ा फच्चर हत्थे से उखड़ गया. पार्टी में अब कोई और ‘वाणी’ नहीं बची है. बस अब नमोराज है, नमोजाप है, नमोनाम है.
ठीक है कि संघ की नमो-स्थापना अन्ततः निर्विघ्न सम्पन्न हो गयी और पार्टी के सारे ‘अ-सुरों’ को आख़िर सुर में सुर मिला कर नमो राग गाना पड़ा. यह मजबूरी के चने थे जो सबको चबाने पड़े. लेकिन ऐसे बेढंगे चने अकसर आसानी से हज़म नहीं होते और कई बार कई-कई दिनों तक पेट में गड़ते रहते हैं. अगर हाज़मा ख़राब हो तो बहादुर से बहादुर और कुशल से कुशल सैनिक भी युद्ध क्षेत्र में तलवार के बजाय पेट ही पकड़े दिखायी देता है. इसलिए चक्रव्यूह का पहला चक्र भेद चुकने के बाद अब नमो को सबसे पहले अपनी पार्टी के कई नेताओं के बिगड़े हाज़मे की तरफ़ ध्यान देना होगा. समस्या यह है कि बीमारों की यह लाइन ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही लम्बी नज़र आ रही है. इनमें कुछ बोले बीमार हैं , जिन्हें दुनिया जानती है, तो बहुत-से अबोले बीमार भी हैं, जिन्हें कोई नहीं जानता. इतने बीमारों का इलाज कैसे होगा, यह मोदी की सबसे बड़ी चुनौती होगी. 
यानी मोदी अन्दर भी लड़ेंगे और बाहर भी. अन्दर अपनी पार्टी में और बाहर अपने चुनावी प्रतिद्वन्द्वियों से. पार्टी ऊपर से लेकर नीचे तक साफ़-साफ़ दो हिस्सों में बँटी हुई है. एक वह लोग हैं जो मोदी के साथ हैं और दूसरे वह जो महज़ फ़ोटुओं में साथ दिख रहे हैं.
मोदी के सबसे बड़े दुश्मन मोदी ही हैं. मोदी यानी उनकी छवि. वही उनकी सबसे बड़ी दुश्मन है, जो न पार्टी के भीतर उनका पीछा छोड़ती और न पार्टी के बाहर! यह बात विचित्र लगती है कि मोदी की छवि और उनका गुजरात माॅडल ही उनका सबसे बड़ा हथियार भी है और उनका सबसे बड़ा शत्रु भी. उनकी छवि के कई रूप हैं, एक जिसे वह ख़ूब बढ़-चढ़ कर और अकसर राई का पहाड़ बना कर प्रचारित करते हैं, वही विकास, गवर्नेन्स, दृढ़ नेतृत्व, त्वरित निर्णय आदि-आदि. उनकी दूसरी छवि बुलडोज़र की है. गुजरात में बीजेपी मोदी से ही शुरू होती है और मोदी पर ही ख़त्म होती है. वहाँ पार्टी के सारे दिग्गज नेताओं को वह भूतपूर्व बना चुके हैं. ऐसे में दिल्ली और दूसरे प्रदेशों में बीजेपी के दिग्गज महारथियों को मोदी का दिल्ली आक्रमण भला कैसे सुहाये? सबको पता है कि अगर मोदी अपने मिशन पीएम में कामयाब हो गये तो बीजेपी का गुजरात माॅडल देर-सबेर दिल्ली और बाक़ी इलाक़ों में भी लागू होगा और शायद भूतपूर्व वाली तख़्तियों की संख्या अभूतपूर्व ढंग से बढ़ जाए.
इसी बुलडोज़र छवि के साथ तीसरी छवि है दंगों की, मुसलमानों को ‘सबक़’ सिखा देनेवाले एक ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ मुख्यमंत्री की. हालाँकि मोदी ने हाल में ख़ुद ही घोषित किया कि वह ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ हैं और उनके समर्थकों ने देश भर में पोस्टर लगा कर इस एलान को गर्व से प्रचारित किया. वैसे मोदी यह न भी करते तो भी किसी को उनके ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ होने में कभी कोई सन्देह नहीं रहा, न तो उनके समर्थकों को और न ही उनके विरोधियों को. कुछ लोग हैरान हैं कि मोदी को अपने आपको नये सिरे से ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ के तौर पर स्थापित करने की ज़रूरत क्यों पड़ी? ख़ास कर तब, जब अपनी मुसलिम-विरोधी छवि की ‘ड्राई क्लीनिंग’ भी उनकी रणनीति के लिए ज़रूरी हो.
है न ज़बरदस्त विरोधाभास! एक तरफ़ ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ का पोस्टर ब्वाय, दूसरी तरफ़ सभाओं में बड़ी मशक़्क़त करके बुर्क़ेवालियों और टोपीवालों की मजमेबाज़ी. कोई मौक़ा ऐसा न छूटे जब कोई ‘दाढ़ीवाला बन्दा’ मोदी के लिए दिल न्योछावर करता नज़र न आये. और फिर ताजपोशी जुमे को हो और कुरता हरा हो! और कितने सबूत चाहिए आपको कि मोदी मुसलिम विरोधी नहीं हैं और सारे मुसलमान मोदी को ख़ारिज नहीं करते. 
मोदी को मालूम है कि उन्हें अपनी मुसलिम विरोधी छवि कितनी धोनी है. बस ज़रा-सी. या यों कहें कि धोनी नहीं, बल्कि उस पर कहीं-कहीं यह मुलम्मा चढ़ाना है कि मुसलमानों को मोदी से अब वैसा परहेज़ नहीं रहा तो अब वीसा को लेकर घिस-घिस रुके. दूसरी बात यह कि चुनाव बाद ज़रूरत हो तो कुछ नये सहयोगियों के लिए मोदी से हाथ मिलाने का, आँखों की शर्म छुपाने का कोई रत्ती भर बहाना तो हो. इसलिए मोदी ‘सेकुलर’ हुए बिना सावधानी से मुसलमानों का जमावड़ा भी लगाते हैं और ख़ुद को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ भी घोषित करते हैं ताकि उनको लेकर हो रहा ध्रुवीकरण चलता और बढ़ता रहे.
अचरज की बात है कि नमोरथ की यात्रा में अड़ंगा डाल रहे बीजेपी के तमाम नेताओं का तर्क यही था कि मोदी के नाम की घोषणा से ध्रुवीकरण होगा. लेकिन शायद संघ की नयी रणनीति है कि ध्रुवीकरण हो. संघ को लगता है कि मोदी के ज़रिये अगर 2014 में निशाना लग गया तो लग गया, वरना इस बहाने वह बीजेपी का पूरा चेहरा-मोहरा बदल कर हिन्दुत्व के नये संस्करण को देश की राजनीति में उतार सकता है, जो मन्दिर आन्दोलन जैसी भदेस बैसाखियों पर न टिका हो, बल्कि विकास, कारपोरेट ग्रोथ, इंडिया स्टोरी जैसे चमकदार चाँदी वर्क में लपेटा हुआ बीड़ा हो. चुनाव तो 2014 के बाद भी आयेंगे. संघ इन्तज़ार कर लेगा. तब तक हरा समंदर, गोपी चन्दर, बोल मेरी मछली कितना पानी!
(अमर उजाला, 16 सितम्बर 2013 के अंक में प्रकाशित)
(अख़बार ने इसका शीर्षक लगाया था : छवि से बाहर निकलने की चुनौती)

No Replies to "नमोरथ का मनोरथ : 2014 या उससे आगे?"


    Got something to say?

    Some html is OK