कब तक चलेगी ये वोटखेंचू राजनीति?

Posted on February 17, 2013

जो लोग ये मानते हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियाँजनविरोधीऔरग़रीबविरोधीहैं, उन्हेंबन्दके हल्लेग़ुल्ले‘, ‘थर्ड फ़्रंट की तिकड़मऔर सरकार के लिए संकट खड़ा करने के बजाय क्या आर्थिक नीति का कोई वैकल्पिक माॅडल देश के सामने नहीं रखना चाहिए था ताकि देश की जनता यह तय कर सके कि उसके लिए कौनसा रास्ता सही है.”

 

पिछले एक हफ़्ते से चल रही राजनीतिक नौटंकी आख़िर ख़त्म हो गयी. उन क़यासबाज़ों को सचमुच बड़ी निराशा हुई होगी, जो सरकार के गिरने और मध्यावधि चुनाव की अटकलें लगालगा कर अपने फेफड़े थका रहे थे. तृणमूल काँग्रेस के हट जाने के बावजूद अब ये तय है कि सरकार नहीं गिरेगी, कम से कम तब तक, जब तक मायावती और मुलायम में से कोई एक यूपीए के साथ बना रहता है. फ़िलहाल तो दोनों की जुगलबन्दी सरकार के साथ चल रही है.

सवाल एक सरकार के बने रहने या बने रहने का नहीं है. एक सरकार जायेगी तो दूसरी आयेगी. दरअसल, ये असली सवाल एक बार फिर हमारे सामने मुँह बाये खड़ा है कि हमारी राजनीति का मक़सद आख़िर क्या है?आख़िर गाल बजाने की येहाहा, हूहूकी वोटखेंचू राजनीति हमारे देश में कब तक चलेगी?
इसमें कोई शक नहीं कि महँगाई, सब्सिडी और विदेशी निवेश का सवाल भारत जैसी अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए एक बड़ा ही महत्वपूर्ण और गम्भीर आर्थिक मुद्दा है और विश्व अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को देखते हुए तो यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि तमाम राजनीतिक दल इस पर ईमानदारी से अपना रुख सामने रखें, कि इस पर टुच्ची राजनीति की जाये, जो दुर्भाग्य से हमारे यहाँ हर बार होती है और इस बार भी हुई. पुर्तगाल, स्पेन और ग्रीस समेत दुनिया के कुछ देश जिस तरह के गम्भीर आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं, उसे देखते हुए क्या यह ज़रूरी नहीं कि ऐसे गम्भीर आर्थिक सवालों पर बात करते समय अपनी पार्टी के राजनीतिक भविष्य के बजाय देश के भविष्य को तरजीह दी जाये?
जो लोग ये मानते हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियाँजनविरोधीऔरग़रीबविरोधीहैं, उन्हेंबन्दके हल्लेग़ुल्ले‘, ‘थर्ड फ़्रंट की तिकड़मऔर सरकार के लिए संकट खड़ा करने के बजाय क्या आर्थिक नीति का कोई वैकल्पिक माॅडल देश के सामने नहीं रखना चाहिए था ताकि देश की जनता यह तय कर सके कि उसके लिए कौनसा रास्ता सही है. बीजेपी हो या लेफ़्ट, ममता हों या मुलायम या मायावती या करुणानिधि या चन्द्रबाबू नायडू या और भी वे सारे दल, जो सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे हैं, क्यों उनमें से किसी एक ने भी देश के सामने ऐसा कोई आर्थिक चार्टर नहीं रखा कि अगर मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियाँ ग़लत हैं तो देश को अगले दस सालों के लिए ऐसा कौनसा रास्ता चुनना चाहिए जो देश के आर्थिक विकास के लिए सही होगा, जिससे महँगाई घटेगी, ग़रीबों को राहत मिलेगी, वित्तीय घाटा क़ाबू में आयेगा, निवेश बढ़ेगा और विकास दर बढ़ेगी. पर किसी भी राजनीतिक दल ने शब्दों की बाजीगरी और अपनी राजनीतिक गोटियाँ साधने के अलावा कुछ नहीं किया!
अब बीजेपी को ही लीजिए. पार्टी लम्बे समय तक रिटेल में एफ़डीआइ की पक्षधर रही है. एनडीए सरकार के दौरान 2000 में विभिन्न सेक्टरों में विदेशी निवेश पर नीतिनिर्धारण के लिए एक मंत्रिमंडलीय समूह गठित किया गया था. सन 2002 में समूह के विचारार्थ एक नोट तैयार किया गया, जिसमें रिटेल में सौ प्रतिशत तक एफ़डीआइ निवेश की ज़ोरदार पैरवी की गयी थी. यह अलग बात है कि इस पर बात तब ज़यादा आगे नहीं बढ़ी. बाद में 2004 में एनडीए के चुनावी घोषणापत्र में भी रिटेल में 26 प्रतिशत एफ़डीआइ की बात कही गयी. बीजेपी का कहना है कि 2009 के चुनावी घोषणापत्र में उसने अपने रुख़ में परिवर्तन कर लिया और उसके बाद से वह रिटेल में एफ़डीआइ के सख़्त विरुद्ध है. एक ज़िम्मेदार राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते बीजेपी को स्पष्ट करना चाहिए था कि एफ़डीआइ का दरवाज़ा खोलने वाले दुनिया के किन देशों के नकारात्मक अनुभवों के कारण उसने अन्ततः अपना रुख़ बदला? इस बदलाव के पीछे व्यापारी वोटों के खोने की चिन्ता है या सचमुच कोई ठोस आर्थिक कारण? आपको शायद याद होगा कि अगस्त 2007 में मायावती ने व्यापारियों के विरोध के चलते उत्तर प्रदेश में रिलायंस रिटेल को काम करने से रोक दिया था. बीजेपी केहृदयपरिवर्तनके पीछे मायावती से मिली सीख है या और कुछ? क्योंकि खुदरा व्यापारी बीजेपी के काफ़ी बड़े वोट बैंक हैं.
और अब बात दीदी की. अगर वह डीज़ल और एलपीजी पर से सब्सिडी कम करने के फैसले का विरोध कर रही थीं, तो यह बात समझ में आती है क्योंकि पश्चिम बंगाल में उनके मतदाताओं के एक बहुत बड़े वर्ग पर यह मार पड़ रही थी. लेकिन रिटेल में एफ़डीआइ पर वह क्यों इतनी बिफरीं? वह अपने राज्य में इसे लागू करतीं. पर ममता की कुछ मजबूरियाँ थीं. पश्चिम बंगाल में उनके सामने है लेफ़्ट फ़्रंट. उन्हें अपनी इमेज कम से कम ऐसी तो रखनी ही है कि वह लेफ़्ट के मुक़ाबले ग़रीबों की ज़्यादा बड़ी मसीहा लगें. लेफ़्ट जिस मुद्दे के विरोध में इतना मुखर हो कर खड़ा हो, ममता उस पर नरम होने का जोखिम कैसे ले सकतीं थीं? इसलिए लेफ़्ट से भी ज़्यादालेफ़्टदिखना उनके लिए फ़ायदे का सौदा था. फिरजुमापढ़ने के बाद समर्थन वापस लेना है, ताकि मुसलमान भी बिछ जायें उनकी इस अदा पर. तो दीदी, क्या ये सिर्फ़ विरोध था या वोटों की राजनीति?
अब मुलायम सिंह को देखिए. वह एक दिन पहलेभारत बन्दकी अगुआई करते हैं, ‘थर्ड फ़्रंट के मुखियाके तौर पर पेश किये जाते हैं और अगले ही दिन घोषणा कर देते हैं कि एफ़डीआइ और सब्सिडी घटाने के धुर विरोधी होने के बावजूदसाम्प्रदायिक ताक़तोंको सत्ता में आने देने के लिए वह मनमोहन सरकार को नहीं गिरने देंगे. क्या कहने इस मासूमियत के!
मायावती जी भी ग़रीबों की बहुत बड़ी हितैषी हैं और सरकार के इस क़दम की घोर विरोधी हैं, फिर भी सरकार को समर्थन देना जारी रखेंगी! मुलायम और मायाएकदूसरे के दुश्मन, दोनों एफ़डीआइ विरोधी, लेकिन दोनों सरकार के साथ! दरअसल, अभी मुलायम मध्यावधि चुनाव चाहते हैं और मायावती. दोनों के अपने अलगअलग कारण हैं. मुलायम को लगता है कि अभी उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार ऐसा कुछ कर नहीं सकी है कि चुनाव हों तो उनके सांसदों की संख्या में कोई उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हो पायेगी. उनका लक्ष्य है कि अगले लोकसभा चुनाव में कम से कम पचाससाठ सांसद तो उनकी पार्टी से जीतें ही, तो हो सकता है कि थर्ड फ़्रंट के प्रधानमंत्री के तौर पर उनका ही दाँव लग जाये! इस बीच, समर्थन की क़ीमत के तौर पर केन्द्र से उत्तर प्रदेश के लिए कोई बड़ा पैकेज भी खींच लेंगे!
उधर, मायावती को लगता है कि चुनाव जितनी देर में होंगे, उतना ही उनके लिए बेहतर होगा. माया राज की यादें अभी उत्तर प्रदेश के लोगों के दिलों में ताज़ा हैं, जैसेजैसे दिन बीतेंगे, यादें धुँधलाती जायेंगी, मौजूदा सपा सरकार के ख़िलाफ़ कुछएंटीइन्कम्बेन्सीहोगी, इसलिए चुनाव 2014 में हों, यही उनके फ़ायदे में होगा! और जब तक अगले चुनाव नहीं होते, तब तककाँग्रेस का हाथमायावती को उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार केपंजेसे भी बचा कर रखेगा.
तो कुल मिलाकर सबकी निगाहें अपनेअपने निशानों पर थीं और हैं. इसमें ग़रीब कहाँ, जनता कहाँ और देश कहाँ?   ये अलग बात है कि काँग्रेस आज सत्ता में है और देश की दुहाई दे रही है, लेकिन अगर आज वह विपक्ष में होती तो क्या वही कर रही होती जो आज तमाम दूसरी पार्टियाँ कर रही हैं? वह भी निस्सन्देह यही करती क्योंकि दुर्भाग्य से हमने ऐसी ही लोकतांत्रिक रूढ़ियों को सींचा है, जहाँ सब कुछ वोटों के आगेपीछे घूमता है.
लेकिन आज ज़रूरत है बिलकुल नये तरीक़े से सोचने की और लोकतंत्र की नयी इबारतों को लिखने की, क्योंकि दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है, दुनिया के सोचने और काम करने के तरीक़े कहीं ज़्यादा तेज़ी से बदल रहे हैं. हम एक नयी विश्व व्यवस्था के मुहाने पर हैं, जिसमें भारत जैसे उभरते हुए देश के लिए अनन्त सम्भावनाएँ बन रही हैं. हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, आबादी के हिसाब से. क्या हम ये सपना नहीं देखें कि हमें सही अर्थों में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनना चाहिए, जो आर्थिकराजनीतिक पटल पर दुनिया का नेतृत्व करे. आइए, सोचें कि भविष्य के एक ज़िम्मेदार लोकतंत्र का ख़ाका कैसा होना चाहिए, जिसमें वोटों की गिनतियों के बावजूद राजनीतिक दलों का आचरण ऐसे मार्गदर्शक सिद्धाँतों पर चले, जिसमें राजनीति लोकहित के लिए हो. काँग्रेस और बीजेपीइन दो बड़ी पार्टियों को तो कम से कम इस बारे में गम्भीरता से सोचना चाहिए, क्योंकि अगले कुछ सालों तक भारत की राजनीति में इन दोनों बड़ी पार्टियों की ध्रुवीय भूमिका बनी रहेगी. देश का जो भी भविष्य लिखा जायेगा, उसमें ये दोनों पार्टियाँ अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकतीं.
(एफडीआइ मुद्दे पर चल रही राजनीतिक जोड़तोड़ पर लोकमत, नागपुर के लिए 22 सितम्बर 2012 को लिखा गया आलेख)

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