अटपटी सम्भावनाओं के स्वप्न!

Posted on February 24, 2013

“आख़िर मौलाना महमूद मदनी अचानक ऐसी ‘अटपटी’ सम्भावनाओं का स्वप्न क्यों बुनने लग गये कि 2014 आते-आते मुसलमानों को बीजेपी और मोदी अच्छे भी लगने लग सकते हैं!”

हुज़ूर मदनी साहब, आख़िर माजरा क्या है? क़यास पर क़यास लग रहे हैं. लोग अपनी-अपनी अक़्ल के घोड़े दौड़ा कर पता करने में लगे हैं. बीजेपी ख़ुश है! माफ़ कीजिएगा, मुझे अचानक ‘रंगा ख़ुश’ याद आ गया! बेचारी सेकुलर पार्टियों का तो मुँह ही उतर गया. सारे देश के मुल्ला-मौलवियों की नींद अचानक टूट गयी. दारुल उलूम देवबन्द जैसी संस्था से जुड़े और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के महासचिव मौलाना महमूद मदनी का दिल अगर नरेन्द्र मोदी को लेकर पसीजने लगे तो धमाका तो होगा ही.
वैसे मदनी साहब का कहना है कि उन्होंने अपने इंटरव्यू में तो सिर्फ ज़मीनी हक़ीक़त का ज़िक्र किया था कि गुजरात में बहुत-से मुसलमानों ने इस बार मोदी को वोट दिया. बिहार में भी नीतिश कुमार के कारण कई जगहों पर मुसलमानों ने  बीजेपी को वोट दिया है. यानी “बड़ा चेंज आ रहा है, सिचुएशन चेंज हो रही है और यक़ीनन गुजरात के लोग (मुसलमान) अलग तरीक़े से सोच रहे हैं.” हालाँकि वह आगे साफ़ करते हैं कि ज़रूरी नहीं कि जो कुछ गुजरात और बिहार में घटित हो रहा है, उसका प्रतिबिम्ब पूरे देश में दिखे, लेकिन उन्होंने एक बेहद महत्त्वपूर्ण बात कही, जिसकी तरफ़ शायद लोगों का ध्यान नहीं गया. उन्होंने कहा, “2002 की दुर्घटना को जितने गर्व के साथ वह (मोदी) लेते आये हैं, वह इसमें सबसे बड़ी रुकावट है कि हम कह दें कि सब ठीक है.” जब उनसे पूछा गया कि अब तो मोदी उन सब बातों की कोई चर्चा नहीं करते और सिर्फ विकास की बात करते हैं तो मदनी साहब का जवाब था,”कुछ अफ़सोस (गुजरात दंगों पर) होना चाहिए था. विकास इन्साफ़ के बग़ैर कैसे होगा?” और मदनी ने यह भी साफ़ किया कि उनकी नज़र में सेकुलर पार्टियाँ मोदी या बीजेपी से बेहतर नहीं हैं!
इसका क्या मतलब निकाला जाय? आख़िर मौलाना महमूद मदनी अचानक ऐसी ‘अटपटी’ सम्भावनाओं का स्वप्न क्यों बुनने लग गये कि 2014 आते-आते मुसलमानों को बीजेपी और मोदी अच्छे भी लगने लग सकते हैं! और सेकुलर पार्टियों से मौलाना का मोहभंग अभी ही क्यों हुआ? क्या सचमुच मुसलमान सेकुलर पार्टियों से निराश हो चुके हैं और उन्हें नये ठिकाने की तलाश है? या फिर सचमुच मौलाना मोदी को ‘विकासपुरुष’ मानने लगे हैं और उन्हें लगता है कि अगर मोदी वाक़ई प्रधानमंत्री बनने ही वाले हैं तो फिर देश के मुसलमान अपने गुजराती भाइयों से सीखते हुए क्यों न मोदी से दोस्ती के रिश्ते क़ायम करें! हो सकता है कि मौलाना को लगा हो कि अगर यूरोपियन यूनियन इतने बरसों के बाद मोदी से फिर संवाद शुरू करता है तो मुसलमान भी अगर अपना नज़रिया बदलने के बारे में सोचें तो पहाड़ थोड़े ही टूट पड़ेगा. आख़िर बिहार और गुजरात के उदाहरण सामने हैं!
पूरे इंटरव्यू में मौलाना मदनी ने एक बार भी नहीं कहा कि मोदी को माफ़ी माँगनी चाहिए. शायद उन्हें मालूम है कि मोदी क़तई माफ़ी नहीं माँगेंगे, इसीलिए वह कहते हैं कि मोदी को दंगों पर अफ़सोस जताना चाहिए. यह सब बहुत चौंकाने वाला है, ख़ासकर तब जब यह शिग़ूफ़ा उस देवबन्द से आया हो, जिसने अभी डेढ़ साल पहले ही मोदी की तारीफ़ करने के आरोप में अपने गुजराती कुलपति मौलाना ग़ुलाम वस्तानवी को बरख़ास्त कर दिया था और उनकी बरख़ास्तगी में मौलाना महमूद मदनी का बड़ा हाथ था. तब से अब तक स्थिति में सिर्फ एक बदलाव हुआ है, वह यह कि बहुत-से लोगों को लगने लगा है कि मोदी प्रधानमंत्री पद के तगड़े दावेदार हैं और अगर कहीं बाज़ी मोदी के हाथ लग ही गयी तो ऐसे में उनकी गोटियाँ सही जगह होनी चाहिए.
बहरहाल, मदनी साहब की दिली ख़्वाहिश क्या है, वही जानें. यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है. हम तो इस शिगूफ़े को खुरच-खुरच कर देखना चाहते हैं कि इसका मक़सद आख़िर क्या हो सकता है? मदनी के इंटरव्यू पर जिस तरह दनादन मुसलिम धर्मगुरुओं की तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आयीं, उसे देख कर तो नहीं लगता कि मोदी के मामले में आम मुसलमानों के मन में अगले साल-डेढ़ साल में कोई नरमी आयेगी. गुजरात का मुसलमान विकल्पहीनता की जिस लाचारी के तले घुट-घुट कर जीने को अभिशप्त है, वैसी कोई स्थिति देश भर में कहीं भी मुसलमानों के सामने नहीं है. उनके सामने विकल्प ही विकल्प हैं. पिछले कई चुनावों को देखें तो मुसलिम वोटों में एक ख़ास तरह का पैटर्न दिखता है, वह है वोटों के नितान्त स्थानीय ध्रुवीकरण का, यानी जिस चुनाव क्षेत्र में जो उम्मीदवार बीजेपी को हराने में सबसे ज़्यादा सक्षम हो, उसे वोट दिया जाय. मुझे लगता है कि इस बार यह ध्रुवीकरण पहले से और भी ज़्यादा मज़बूती से होगा.
तो फिर यह शिगूफ़ा क्यों? मोदी भी जानते हैं और मदनी भी कि हमेशा से बीजेपी के विरुद्ध रहे मुसलिम वोटर को ऐसे रातोंरात बहलाया नहीं जा सकता. लेकिन इस तरह की बातें अगर हवा में तैरती रहें तो मोदी को दो बड़े फ़ायदे होंगे. पहला यह कि मुसलमानों में उनके समर्थक कुछ ऐसे प्रभावशाली प्रवक्ता निकल आयेंगे, जो आम मुसलमानों के बीच धीरे-धीरे यह सन्देश फैलाते रहें कि मोदी से दुश्मनी पालने में नुक़सान ही नुक़सान है. न गुज़रा हुआ समय वापस लाया जा सकता है और न ही पहले हो चुके नुक़सान की भरपाई हो सकती है. भलाई इसी में है कि मुसलमान पिछली बातों को भूल कर विकास की गाड़ी में सवार हो लें. ऐसे प्रचार से मुसलमानों के विरोध की धार कुन्द होती जायेगी. दूसरा फ़ायदा यह होगा कि मोदी एक तरफ़ तो दुनिया को यह दिखाने में कामयाब हो जायेंगे कि मुसलमानों में भी उनकी स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है और दूसरी तरफ़ वह ‘सेकुलर माइंडसेट’ वाले हिन्दू वोटरों के बीच भी अपनी धुली-पुँछी छवि के साथ विकास के अपने झुनझुने की अपील बढ़ा पायेंगे.
मोदी युद्धकला के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं, प्रचार युद्ध में उनका कोई जवाब नहीं, ‘इमेज वाॅर’ की बारीकियों को उनसे बेहतर भला और कौन समझता है, इसका सबूत वह पिछले विधानसभा चुनाव में और अभी यूरोपियन यूनियन के मामले में दे चुके हैं. यह नया शिगूफ़ा भी उसी की एक कड़ी है. अभी-अभी अपनी रणनीति में भी उन्होंने व्यापक बदलाव किया है और महाकुम्भ में मथी गयी ‘हिन्दू लहर’ पर सवार होने के बजाय फ़िलहाल ‘इन्क्लूसिव डेवलपमेंट’ के मुखौटे को पहनने का फ़ैसला किया है.

(दैनिक हिन्दुस्तान, 22 फ़रवरी 2013)


No Replies to "अटपटी सम्भावनाओं के स्वप्न!"


    Got something to say?

    Some html is OK